Sunday, July 19, 2009

नुशरत फ़तेह अली खान की यादगार बोल

मोरे अंग-अंग बाजे मधुर बांसुरी तोरी यादों के छैंय्या तले।

धीरे-धीरे पवन नाचो हे मोरा मन,

धीरे धीरे पवन नाचो हे मोरा मन जैसे नदिया में नैय्या चले।

मोरे अंग-अंग बाजे..........................,

आज सपनो की नगरी में खो जाउंगी ,

आज अपने पिया की में हो जाउंगी ।

मेरे हाथन की मेंहदी अगन रूप हे,

मेरे हाथन की ............................,

जैसे सूरज हो शाम ढले।

आ सवारिया में कब से तेरी चाह में ,

नैन बनके बिछी हूँ तेरी राह में,

मेरे मन का दिया जल रहा हे पिया,

मेरे मन का दिया जल रहा हे पिया ॥

बेरी चन्दा जले न जले।

मोरे अंग -अंग बाजे मधुर बांसुरी तोरी यादों के छैंय्या तले॥

धीरे -धीरे पवन नाचो हे मोरा मन जैसे नदिया में नैय्या चले॥



Saturday, May 23, 2009

अपन गाम


हमरा बजबैये अपन ओ गाम यौ
मनो नै भाबैये दिल्ली सन टाउन यौ
स्कूलक पछुआर मे पाकरिक गाछ यौ
हमरा सतबैये बहिनक याद यौ
आमक गाछी के बड़का मचान यौ
गाछी मे मिलीजुलि कs पकबैत पकवान यौ,
मोन परैये परोड़क अचार यौ ,
ओझाजीक भोजन मे काकिक सचार यौ,
कहिया हम जेबै अपन ओ गाम यौ ,
मनो नै भाबैये दिल्ली सन टाऊन यौ ....

Friday, May 22, 2009

जिंदगी

जिंदगी उमंग है,
जो मेरे संग है,
इसके जितने रंग है...
सब मैं आनंद हैं,
जिंदगी एक ख्वाब है,
ये तो एह्शाश है,
एह्शाश काफी खाश है...
जिंदगी मेरे पास है.............

Wednesday, April 15, 2009

तुम्हे भुला देने को मैंने..............

तुम्हे भुला देने को मैंने
कितने अलग रस्ते बदले ,
किंतु तुम्हारे पाँव जंहाँ भी ,
जाता हूँ अंकित मिलते हैं ।
वह बांसुरी तोड़ दी मैंने जिसमे बंद तुम्हारे स्वर थे,
वे सब जगह खुरच दी मैंने ,यंहा तुम्हारे हस्ताक्षर थे।
तुम्हें भुला देने को मैंने रोपे फूल लताएँ सींची,
किंतु तुम्हारी देह - गंध ही,
देते हुए सुमन खिलते हैं।
खोले द्वार सभी वो मैंने जो ख़ुद तुम बंद किए थे,
वे सब कम किए गिन गिन कर बेहद तुमको नापसंद थे।
तुम्हें भुला देने को मैंने महलों से सम्बन्ध बनाये,
उनकी छायादार गली मैं ,
चलते मगर पांव जलतें हैं ,
इतनी भीड़ जुटाई मैंने चरों ओर खड़े अपने हैं।
लगता है लेकिन सबके सब सिर्फ़ अपरिचित हैं सपने हैं।

"अंशु" नाम दे दूँ.

दिल चाहता है जिन्दगी को एक मुकाम दे दूँ ।
दिल के कोने में छुपे दर्द को एक नाम दे दूँ ।
अपनी तनहाइयों को पैगाम दे दूँ ।
अरसे से छुपे दर्द को शब्दों में बयां कर दूँ ।
उन्हें सुरों में पिरो कर "अंशु" नाम दे दूँ ।